
[प्रकाश साहू, जांजगीर-चाम्पा]
जांजगीर-चाम्पा : कहते है रेलवे फाटक बनाने का मुख्य उद्देश्य रेल पटरियों को पार करने वाले वाहनों और पैदल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है. लेकिन जांजगीर-चाम्पा के कोसमन्दा गांव में बना यह रेलवे फाटक बनने के बाद इसका उद्देश्य उल्टा पड़ गया है. अमरैया पारा का यह फाटक दिनों-दिन लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनते जा रहा है, क्यों कि इस रेलवे फाटक की वजह से कई जिंदगी छीन गई है. इस फाटक से गुजरने से पहले हजारों बार भी सोचना पड़े तो ये भी कम ही होगा. क्यों कि फाटक से गूँजने वाला व्यक्ति कभी अपने मंजिल तक वक्त पर नहीं पहुंचता. सबसे बड़ी बात फाटक की वजह से मरीज को वक्त पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते और उनकी मौत हो जाती है. ऐसे में फाटक किसी जान लेवा रेलवे फाटक से कम नही है.
रेलवे फाटक पर रुक जाती है ट्रेन
वैसे तो आपने ट्रेन को आउटर में रुकते देखा होगा, लेकिन कोसमन्दा गांव के इस फाटक पर सिग्नल नहीं मिलने से बीचों बीच रुक जाती है, जिससे घंटो फाटक पार नहीं किया जा सकता. छात्र-छात्रा जान जोखिम में डालकर ट्रेन के नीचे से पार करते हैं. जिससे हादसे का खतरा बना रहता है और इसी बात से समस्याओं का अंदाजा लगाया जा सकता है. ग्रामीणों ने कई बार इसकी शिकायत भी की है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं निकला. ना जिला प्रशासन ध्यान देता है और ना ही रेलवे के अधिकारी!, जिससे ग्रामीण और फाटक से गुजरने वाले लोग जद्दोजहद करने मजबूर हैं.
क्या बोलते हैं अधिकारी
रेलवे के अधिकारियों से जब हमने बात की तो उन्हें कहा कि लोगों को सुविधा उपलब्ध कराना उनका उद्देश्य है. अगर इस तरह की परेशानी लोगों को हो रही है तो इस विषय पर जानकारी जुटाई जाएगी. साथ ही, समस्या के हल निकालने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा.
आखिर कब जागेंगे अधिकारी?
अधिकारियों के कान में जाने के बाद भी न उन्हें समस्या दिखी ना समाधान के लिए कोई रास्ता निकाला गया. अब सवाल यह है कि आखिर जब फाटक लोगों के सहूलियत के लिए है तो फाटक बनने के कई सालों बाद क्यों ट्रेन को फाटक के बीचों-बीच रुकवा दी जाती है. क्यों ट्रेनों को सिंग्नल नहीं दिया जाता. अब देखने वाली बात होगी कि ग्रामीणों की समस्या का हल निकाला जाता है या ऐसे ही समस्या झेलने ग्रामीण मजबूर रहते हैं.
